मेकाहारा अस्पताल में बाउंसरों की गुंडागर्दी: पत्रकार से मारपीट, जान से मारने की धमकी

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मेकाहारा अस्पताल में रविवार रात एक पत्रकार के साथ बाउंसरों द्वारा की गई मारपीट और धमकी की घटना ने राज्यभर के पत्रकारों में आक्रोश की लहर दौड़ा दी है। अस्पताल में रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकार के साथ सुरक्षा में तैनात निजी बाउंसरों ने न केवल मारपीट की, बल्कि उसे जान से मारने की धमकी भी दी। इस घटना के विरोध में पत्रकारों ने देर रात मुख्यमंत्री निवास के सामने धरना देकर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की।
जानकारी के अनुसार, 24 मई को उरला क्षेत्र में हुई चाकूबाजी की खबर की पुष्टि और जानकारी के लिए एक पत्रकार मेकाहारा अस्पताल पहुंचा था। तभी वहां तैनात बाउंसरों ने उसे रिपोर्टिंग से रोका, जबरन धकेला और अभद्रता की। हालात इस कदर बिगड़े कि बाउंसरों ने मारपीट करते हुए पत्रकार को जान से मारने की धमकी दे डाली। यह पूरी घटना अस्पताल परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई है।
तीन आरोपी गिरफ्तार, पर सवाल अब भी कायम
पुलिस ने मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार जरूर किया है, लेकिन पत्रकार संगठनों और आम जनमानस के बीच यह सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या सिर्फ गिरफ्तारी से न्याय होगा? पत्रकारों का कहना है कि इस घटना से सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों को भी चोट पहुंची है।
अस्पताल प्रशासन की चुप्पी और पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि घटना के बाद भी अस्पताल प्रशासन ने न तो बाउंसरों की निंदा की और न ही उनके खिलाफ कोई तत्काल कदम उठाया। उल्टा, जब पत्रकारों ने धरना प्रदर्शन शुरू किया तो पुलिस बल को अस्पताल और सीएम हाउस के बाहर तैनात कर दिया गया—वो भी पत्रकारों से निपटने के लिए, न कि उनकी सुरक्षा के लिए।
पत्रकार संगठनों की एकजुटता
छत्तीसगढ़ पत्रकार संघ, प्रेस क्लब समेत कई अन्य मीडिया संगठनों ने इस घटना के विरोध में मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने मांग की है कि—
दोषी बाउंसरों को तत्काल बर्खास्त किया जाए,
उन पर सख्त धाराओं में एफआईआर दर्ज हो,
पत्रकारों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रोटोकॉल बनाया जाए,
और पुलिस विभाग अपनी निष्पक्षता सिद्ध करे।
क्या बाउंसरों को मिली है प्रेस पर नियंत्रण की छूट?
घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अस्पताल जैसे सार्वजनिक और संवेदनशील स्थानों पर तैनात निजी बाउंसरों को यह अधिकार है कि वे प्रेस की आज़ादी में हस्तक्षेप करें? क्या इनकी नियुक्ति से पहले कोई चरित्र सत्यापन या प्रशिक्षण होता है? और यदि नहीं, तो यह सीधे-सीधे अस्पताल प्रशासन की गंभीर लापरवाही मानी जानी चाहिए।
प्रेस पर हमले का मतलब आम नागरिकों की आज़ादी पर हमला
जब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के साथ ऐसा व्यवहार होता है, और प्रशासन मूकदर्शक बना रहता है, तो यह न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता बल्कि आम नागरिकों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर भी हमला है। यह घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि यदि समय रहते प्रशासन नहीं जागा, तो कानून व्यवस्था पर से जनता का विश्वास डगमगा सकता है।














